23 July 2017

3 Poems

Three short poems -

इंतिजार
पूछते हो की कब से कर रहा हूँ इंतिजार,
क्यों लेते हो ऐसी परीक्षा बारम्बार ?
अकले - अकले तुमहारे बिन,
निकल गए न जाने कितने दिन;
अब तो मुझ पर करो दया,
नहीं संभलती मुझसे तुम्हारी माया!

***

ईर्षा
कर दो मुझे इस ईर्षा से बरी,
नहीं कर सकता मैं तुम्हारी बराबरी;
नहीं करनी तुम्हारी हर कर्म की नकल,
नहीं करना तुम्हारा चिंतन हर पल;
नहीं करनी अपने हर प्रयास पर शंका,
स्वयं कि सुनने दो, चाहे मिले न तिनका;
नहीं चाहिए तुम्हारी मंजूरी,
 नहीं हैं तुम्हारी राय जरूरी;
भय करता हूँ की स्वयं को खो दूँगा,
फिर भी तुम जैसा कभी न बन पाऊँगा;
बान्ध कर ईर्षा का पाश,
मैंने कर दिया अपने जीवन का सर्वनाश।

***

मुस्कुराहट
कहते हो की मुस्कुराहट कि प्रशंसा नहीं करता,
क्या करूँ कोई शब्द पूरा नहीं पडता;
मंजूर हैं मुझे चुप रहना,
बस तुम ऐसे मुस्कुराते रहना।

1 comment:

Pradeep Singh said...

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